मानवाधिकारों का भविष्य: प्रवृत्तियाँ एवं परिवर्तन” विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्पन्न
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, उत्तराखंड के विधि संकाय द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली के सहयोग से “मानवाधिकारों का भविष्य: प्रवृत्तियाँ एवं परिवर्तन” विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन
किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों, शिक्षाविदों एवं विधि क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों के बीच मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता, समझ एवं संवेदनशीलता को बढ़ाना था।
वर्तमान सामाजिक-वैधानिक परिदृश्य में मानवाधिकारों के बढ़ते महत्व को देखते हुए इस प्रकार के कार्यक्रमों की उपयोगिता अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो सैद्धांतिक ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव के बीच की दूरी को कम करने में सहायक सिद्ध होते हैं।
कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका एवं कार्यप्रणाली से प्रतिभागियों को परिचित कराना, तथा समकालीन मानवाधिकार चुनौतियों पर विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करना शामिल था। इसके अतिरिक्त प्रतिभागियों में न्याय, समानता, गरिमा एवं विधि के शासन के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने पर भी विशेष बल दिया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ विधि विभाग के डॉ. विशाल गुलेरिया के प्रारंभिक उद्बोधन से हुआ, जिसमें उन्होंने मानवाधिकार शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला। इसके पश्चात विधि संकाय की अधिष्ठाता एवं विभागाध्यक्ष डॉ. ममता राणा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए इस प्रकार के कार्यक्रमों को विधि शिक्षा के सुदृढ़ीकरण हेतु आवश्यक बताया। तत्पश्चात कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. हिमानी बिष्ट ने भी अपने संबोधन में प्रतिभागियों से सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया। तत्पश्चात एस.आर.टी. परिसर के निदेशक प्रो ए.ए. बौड़ाई ने गढ़वाल विश्विद्यालय के कुलपति प्रो श्री प्रकाश सिंह सहित सभी विशिष्ट अतिथियों एवं वक्ताओं का औपचारिक स्वागत किया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित कुलपति प्रो श्री प्रकाश सिंह ने अपने उद्बोधन में मानवाधिकारों के संरक्षण एवं संवर्धन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका पर प्रकाश डाला तथा विद्यार्थियों को इस क्षेत्र में सक्रिय योगदान देने के लिए प्रेरित किया। उनके द्वारा कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन भी किया गया। विश्वविद्यालय के डीन रिक्रूटमेंट प्रमोशन प्रो एम एस पंवार ने भी अपने वक्तव्य में यह बताया कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए क्यों जरूरी रहता है।
कार्यक्रम के अंतर्गत चार कुल सत्र आयोजित किए गए, जिनमें विभिन्न विशेषज्ञ वक्ताओं ने अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रथम सत्र में डॉ. जी.एस. धर्मशक्तु सदस्य राज्य मानवाधिकार आयोग देहरादून , उत्तराखंड ने मानवाधिकारों की मूलभूत अवधारणा एवं उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर चर्चा की। द्वितीय सत्र में दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिवक्ता रोहित डंडरियाल ने न्यायिक दृष्टांतों के महत्व एवं उनके समाज पर प्रभाव को स्पष्ट किया।
तृतीय सत्र में यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एनर्जी एंड स्टडीज देहरादून विधि विभाग की डॉ. भारती नायर ने तकनीक की भूमिका को रेखांकित करते हुए उसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पक्षों पर प्रकाश डाला। चतुर्थ सत्र में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण नई टिहरी के सचिव व सिविल जज सीनियर डिवीजन डॉ आलोक राम त्रिपाठी ने मानवाधिकार संस्थाओं, विशेषकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका पर चर्चा करते हुए LGBTQ समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा के महत्व को भी रेखांकित किया।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने सक्रिय रूप से सहभागिता करते हुए वक्ताओं से प्रश्न भी पूछे तथा विभिन्न विषयों पर संवाद स्थापित किया, जिससे सत्र और अधिक ज्ञानवर्धक एवं संवादात्मक बन गए।
कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि मानवाधिकार विषय के प्रति युवाओं में गहरी रुचि एवं जागरूकता है। चारों सत्रों का संचालन विधि विभाग की शोधार्थी गरिमा धर्मसतु द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन विधि विभाग के डॉ. सुधीर कुमार चतुर्वेदी द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने सभी अतिथियों, वक्ताओं, आयोजकों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस प्रकार यह प्रशिक्षण कार्यक्रम ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक सिद्ध हुआ तथा मानवाधिकारों के संरक्षण के प्रति नई सोच और प्रतिबद्धता को प्रोत्साहित करने में सफल रहा।
